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Bombay High Court Challenges Indian Railways

Bombay High Court Challenges Indian Railways Tatkal Ticket No-Refund Policy

भारतीय रेलवे की तत्काल टिकट रद्दीकरण नीति एक बार फिर कानूनी बहस के केंद्र में है। Bombay High Court Challenges Indian Railways में दायर एक जनहित याचिका में उस नियम को चुनौती दी गई है, जिसके तहत कंफर्म तत्काल टिकट रद्द करने पर यात्रियों को कोई रिफंड नहीं दिया जाता। याचिका का कहना है कि यह व्यवस्था न केवल अनुचित है, बल्कि आम यात्रियों के संवैधानिक अधिकारों पर भी असर डालती है।

मकर संक्रांति 2026 के दौरान ट्रेनों की विशेष व्यवस्था और भीड़ को देखते हुए रेलवे की नीतियां यात्रियों के लिए बेहद अहम हो जाती हैं। इसी से जुड़ी पूरी जानकारी आप हमारी यह रिपोर्ट भी पढ़ सकते हैं:
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याचिका का मूल तर्क क्या है?

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि जब कोई यात्री अपना कंफर्म तत्काल टिकट रद्द करता है, तो Indian Railways उसी सीट को तुरंत वेटिंग लिस्ट में मौजूद किसी अन्य यात्री को बेच देता है। इस पूरी प्रक्रिया में रेलवे एक ही सीट के लिए दो बार किराया वसूल लेता है:

  • पहले यात्री से, जिसका पूरा पैसा ‘नो-रिफंड’ नियम के तहत जब्त हो जाता है।
  • दूसरे यात्री से, जिसे वही सीट दोबारा आवंटित की जाती है।

याचिका में इसे “अन्यायपूर्ण लाभ” यानी Unjust Enrichment करार दिया गया है। तर्क यह भी है कि यह नीति संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (गरिमा के साथ जीवन का अधिकार) के खिलाफ जाती है।


RTI से सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े

सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त आंकड़ों का हवाला देते हुए याचिका में बताया गया कि टिकट रद्दीकरण से रेलवे को हर साल भारी कमाई हो रही है:

  • 2022: वेटिंग लिस्ट टिकट रद्द होने से ₹887 करोड़ से ज्यादा की आय
  • 2023: यह राशि बढ़कर ₹1,042 करोड़ से अधिक
  • नवंबर 2023: सिर्फ 13 दिनों में (5 से 17 नवंबर) ₹2.91 करोड़ की कमाई

इन आंकड़ों ने ‘नो-रिफंड’ नीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस पूरे मामले की विस्तृत रिपोर्ट आप Live Law Hindi पर पढ़ सकते हैं, जहां अदालत में दायर याचिका के तर्कों को विस्तार से बताया गया है।


पुरानी नीति का भी दिया गया हवाला

याचिका में यह भी कहा गया है कि 2015 से पहले कुछ जोन, जैसे Northeast Frontier Railway, में तत्काल टिकट रद्द करने पर 25 प्रतिशत तक रिफंड मिलता था। लेकिन 2015 में नियम बदलने के बाद यह सुविधा पूरी तरह खत्म कर दी गई। याचिकाकर्ता के अनुसार यह बदलाव यात्रियों के हितों के खिलाफ था और इसे “जनविरोधी कदम” कहा गया।


याचिकाकर्ता की प्रमुख मांगें

अदालत से निम्नलिखित हस्तक्षेप की मांग की गई है:

  1. उचित रिफंड व्यवस्था
    कंफर्म तत्काल टिकट रद्द करने पर यात्रियों को वाजिब राशि वापस मिले।
  2. आपातकालीन छूट
    चिकित्सा आपात स्थिति या परिवार में मृत्यु जैसे मामलों में पूरा रिफंड दिया जाए।
  3. पारदर्शिता
    रेलवे हर साल तत्काल टिकट बुकिंग और रद्दीकरण से होने वाली कुल कमाई का डेटा सार्वजनिक करे।

वकील का पक्ष

याचिकाकर्ता के वकील Sachin Tiwari ने कहा कि यह मामला करोड़ों मध्यमवर्गीय और गरीब यात्रियों से जुड़ा है, जो रोजमर्रा की यात्रा के लिए रेलवे पर निर्भर हैं। उनके अनुसार, अगर कोई यात्री मजबूरी में टिकट रद्द करता है और उसे एक भी रुपया वापस नहीं मिलता, तो यह व्यवस्था सामाजिक न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।


आगे क्या?

अब सबकी निगाहें बॉम्बे हाईकोर्ट के रुख पर टिकी हैं। अगर अदालत याचिका में उठाए गए मुद्दों को गंभीरता से लेती है, तो रेलवे की तत्काल टिकट नीति में बड़ा बदलाव संभव है। इससे न सिर्फ यात्रियों को राहत मिल सकती है, बल्कि रिफंड सिस्टम में पारदर्शिता भी बढ़ेगी।

इस मामले से जुड़े ताजा अपडेट और कानूनी विश्लेषण के लिए Live Law Hindi की रिपोर्ट्स को नियमित रूप से फॉलो किया जा सकता है।

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